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गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

" त्रिवेणी"

( 1 ) गीली रेत पर कभी उकेरी थी एक तस्वीर ।
समेट ले गई सब कुछ वक्त की लहर ।

बस कुछ शंख सीपियों के निशान बाकी हैं ।।

( 2 ) कभी कभी बेबाक हंसी ।
बेलगाम झरने सरीखी होती है ।

गतिरोध आसानी से हट जाया करते हैं ।।

( 3 ) आज कल बोलने का वक्त है ।
कहने सुनने से आत्मबल बढ़़ जाता है ।

मछली बाजारों में बातें कहां शोर ही सुनता है ।।
XXXXX

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

"माहिया" ( स्वीकारोक्ति )

(1) बचपन कब बीत गया
इस के जाने से
मन मेरा रीत गया

(2) मैं तो बस ये जानूं
तुम को  ही अपना
सच्चा साथी मानूं

(3) लम्बी बातें कितनी
नापूं तो निकले
गहरी सागर जितनी

(4) मैं याद करूं क्या क्या
बीच हमारे थीं
सौ जन्मों की बाधा

(5) छोटी छोटी बातें
अब लगती हैं सब
जन्मों की सौगातें

XXXXX

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

“सीख” (रोला छंद)

विषम चरण  - ११ मात्राएं
सम चरण  - १३ मात्राएं

( १ )   मन ने ठानी आज , सृजन हो नया पुराना ।
        मिली-जुली हो बात , लगे संगम की धारा ।।

( २ )   हो सब का सम्मान , कर्म कुछ ऐसे कीजै ।
        बने एक इतिहास , देख सुन के सब रीझै ।।

( ३ )   रहना सब को साथ , जिद्द होगी बेमानी ।
        विलग करो अभिमान , छोटी सी जिंदगानी ।।

( ४ )   भोर करे संकेत , हुआ है नया सवेरा ।
         दुनिया एक सराय , मुसाफिर वाला डेरा ।।

( ५ )   होते नहीं निराश , राहें और भी बाकी ।
        मन अपने को साध , वही सुख-दुख का साथी ।।

                         XXXXX

सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

"जीवन रंग"

भोर का तारा जा सिमटा
नींद के आगोश में ।
अरूणाभ ऊषा ने
छिड़क दिया सिंदूरी रंग
कुदरत के कैनवास पर ।

पूरी कायनात सज गई
अरूणिम मरकती रंगों से ।
भोर की भंगिमा निखर गई
प्रकृति के विविध अंगों से ।

सात रंगों की उजास ने
सूर्य प्रभामंडल संग मिल
श्वेताभ रंग बिखेर दिया ।
सृष्टि को कर्मठता से
कर्मपथ पर कर्मरत रहने
हेतु संदेश दिया ।

विश्रान्ति काल ……..,
सांझ का तारा ले आया
टिमटिमाता मटियाला कम्बल ।

चाँद-तारों से बात कर
प्राणों में ऊर्जा संचित कर ।
कर्म क्षेत्र की राह पर
कर्मठता का रथ तैयार कर ।

         XXXXX

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

"वक्त"

वक्त मिला है आज , कुछ अपना ढूंढते हैं ।
करें खुद से खुद ही बात , अपना हाल पूछते  हैं ।।

कतरा कतरा वक्त , लम्हों  सा बिखर गया ।
फुर्सत में खाली हाथ , उसे पाने को जूझते हैं ।।

दौड़ती सी जिंदगी , यकबयक थम गई ।
थके हुए से कदम , खुद के निशां ढूंढते हैं ।।

गर्द सी जमी है ,  घर के दर और दीवारों पर  ।
मेरे ही मुझ से गैर बन , मेरा नाम पूछते हैं ।।

ज़िन्दगी की राह में , देखने को मिला अक्सर ।
दोस्त ही दुश्मन बन  , दिल का चैन लूटते हैं ।।

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शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

“तृष्णा”

अभिव्यक्ति शून्य , भावों से रिक्त ।
तृष्णा से पंकिल , ढूंढता असीमित ।।

असीम गहराइयों में , डूबता-तिरता ।
निजत्व की खोज में ,रहता सदा विचलित ।।

दुनियावी गोरखधंधों से , होता बहुत व्यथित ।
सूझे नही राह कोई , हो गया भ्रमित ।।

मृगतृष्णा में फंसे , तृषित हिरण सा ।
मरु लहरियों के जाल से , है बड़ा चकित ।।

तृष्णा में लिपटा , खुद को छलता ।
मेरा मन अपने आप में , होता सदा विस्मित ।।

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गुरुवार, 20 सितंबर 2018

"लघु कविताएं"

( 1 )

तुम्हारे और मेरे बीच
एक थमी हुई झील है
जिसकी हलचल
जम सी गई है ।
जमे भी क्यों नहीं…..,
मौसम की मार से
धूप की गर्माहट
हमारे नेह की
आंच की मानिंद
बुझ सी गई है ।
 ( 2 )

सांस लेने दो इस को
शब्दों पर बंधन क्यों
यह नया सृजन है
कल-कल करता निर्झर
अनुशासनहीन  नहीं
मंजुलता का प्रतीक है
 
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