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बुधवार, 11 मार्च 2015

"बचपन"

बचपन अपने आप मे एक सम्पूर्ण जीवन है.अनोखी कल्पनाएँ-बड़े होकर दुनिया का सब से
बड़ा इन्सान बनने का सपना,ऐसे संसार की कल्पना जहाँ सारी कायनात केवल अपनी मुट्ठी
मे कर लेने की कुव्वत,कुछ सोचना दूसरे ही पल उसे पाने का उल्लास बचपन का यथार्थ है
बड़प्पन मे ये खुशियाँ कहीं खो जाती है.
                                                   बालपन में माँ की साड़ी का पल्लू पकड़ कर बाजार
जाना,कपड़ों की दुकान मे अपने पसन्दीदा रंग के कपड़ों की तरफ अगुँली करना और पा
लेने पर खुशी से झूम उठना अक्सर याद आता है.अपनी कलाई की पहली घड़ी और दिल
की धड़कनों के साथ घड़ी की टिक-टिक का  मखमली अहसास आज भी ना जाने कितने
दिलों में सिहरन पैदा करता होगा.
                                             मगर ये सब बातें ,अहसास 70के दशक से 21वीं सदी की
शुरुआत की बातें हैं.आज के दौर में ये बातें बेमानी हैं .पैसे की कीमत दिनोंदिन महत्वहीन
हुई है.जो चीजें होश संभालने के बाद की बातें थी ;क़क्षा में अव्वल आने की खुशी की थी
वे सब आज स्टेटस सिम्बल बन गई हैं.
                                                    घ़ड़ी पहनने के लिये कक्षा मे
अव्वल आना अनिवार्य नही रह गया है. कपड़ों की रंगीन झिलमिलाहट का मखमली अहसास,
माँ के हाथों से बने खिलौनों की चमक कहीं खो गयी है.
                                                                         मैं यह नही कहती कि सब कुछ गलत है.
आज की तरक्की, तरक्की नही है.मेरा मानना है कि बरगद,पीपल की छाँव अब खो गयी है.
बोनसई वृक्षों की भरमार हो गई है जो मूल का ही रुप है ओर उससे कहीं अधिक खूबसूरत है मगर
नींव के साथ जुड़कर समाज को सुख देने के स्थान पर बेशकीमती सामानों से सजे मॉल्स और
ब़ड़े-बड़े बंगलों के स्वागत-कक्षों की शोभा बढाने मे ज्यादा सफल हैं जिन्हे देख कर मेरे जैसे लोग
कह उठते हैं-"बिलकुल वैसा ही है जैसा अपने गाँव मे स्कूल से आते रास्ते मे पड़ता था;पता है स्कूल
से आते बारिश और धूप मे हम इनके नीचे खड़े हो जाते थे.और अचानक घूरने के अहसास से बगल
के व्यक्ति की अजीब सी नजरों से बचते हुए मैं खामोशी की चादर ओढ़ कर आगे बढ़ जाती हूँ.

मंगलवार, 3 मार्च 2015

"उड़ान"

उसे भी हक दो,वह भी उडना चाहती है,


उसकी परवाजें भी तुम्हारी तरह,
आसमान को छूना चाहती है.
क्यों अनचाहे झपट्टे से उसके हौसले को तोडना चाहते हो?
देखो तो सही,वह कितना डर गई है.
रात भर  उसकी पनीली आँखों मे,
तुम्हारा ही खौफ तैरता रहा.
क्या जीने का हक केवल तुम्हारा है?
तुम्हे मालूम भी है,
कल से उसने ना चुग्गा खाया,
ना पानी पिया.
अब भोर हो गई है
अब तो बीती बातें बिसार दो.
उसको आवाज दो,हौंसला दो,
वह भी तुम्हारी तरह स्वछन्द होकर,
असीम और अनन्त अासमान की
गहराईयों को छूना चाहती है.

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

"दीवारें"

कभी कहीं पढा था दीवारें  मौन होती हैं.बचपन से आज तक  सुनती आयी हूँ दीवारों के कान होते हैं.मेरा मन दीवारों के बारे मे कुछ और ही सोचता है.

लोग कहते हैं दीवारों के कानहोते हैं . हाँ सच है दीवारों के भी कान होते हैं मगर ,
जब दीवारें बोलती हैं तो हर तरफ खामोशी की चादर पसरी होती है,
केवल आपके अन्तर्मन की आवाज बोलती है,
दीवारें तब बोलती है जब एकाकीपन आपके साथ होता है,
दीवारों का बोलना आपके अन्तर्मन की आवाज होती है,
बडी शर्मिली होती है दीवारें, खामोशी में बात करती हैं
इनके केवल कान नही होते;जुबान भी होती है.