मंगलवार, 30 अगस्त 2016

“पथ-प्रदर्शक”

लम्बा कद, सांवला रंग, सूती सफेद धोती और माथे पर चंदन का टीका, आँखें गहरी, कुछ सोचती सी उनकी मुखमुद्रा की गंभीरता उन्हें और महिलाओं की श्रेणी से अलग ही दर्शाती थी। उनके व्यक्तित्व में सादगी की प्रधानता थी। मैनें उन्हें अक्सर पूजा-पाठ में ही डूबे देखा। जब मन का चिन्तन, बैचेनी में बदलता तो माथे की लकीरें गहरी हो जाती और हाथ में थमे सुमरनी के मनके अँगुलियों के बीच तेजी से गति करने लगते मैं काम कर रही होती तो मेरे आस-पास ही होती।  उनकी कोशिश यही रहती कि मैं उनकी नजरों के सामने रहूँ। जेठानी उपहास करती - ‘माँ ध्यान रख रही हैं छोटी बहू का’, लेकिन उनका मौन टूटता चेहरे से निर्लिप्तता के भाव हटते
एक दिन इशारे से पास बुला कर कहा - ‘एक काम करेगी मेरा?  ‘जी हाँ करूंगी….., कहिए! सुनते ही उन्होनें कहा - ‘मेरे भाइयों को कागद लिखवाना है; हिसाब करवा दें मेरा और सुन तुझे यह बात किसी से कहनी नही है उनकी बात सुन कर अन्दर ही अन्दर हिल गई मैं, डर के मारे। जिस बेटे से वे हिसाब चाहती थी वो लिखावट पहचानते थे मेरी, ममता के वशीभूत वे अपने बेटे को समझ पा रहीं थी और अपने भाइयों को। घर की तमाम सम्पति पर उनके बड़े बेटे का मालिकाना हक था और उनके भाई अपने भांजे के रूआब के आगे नतमस्तक थे। मैंने उन्हें टालते हुए कहा -’माँ, मेरी लिखी चिट्ठी अगर उन्होने बड़े भइया को दिखा दी तो घर में महाभारत हो जाएगा, वे लिखावट पहचानते हैं मेरी बात की नजाकत को ध्यान मे रख उन्होने तय किया कि अब की पीहर जाएँगी या कोई आएगा तो वे चर्चा जरुर छेड़ेंगी, और इसी निर्णय के साथ बात वहीं ठहर गई।
हमेशा की तरह मैं रोजमर्रा के काम में व्यस्त थी कि एक दिन तेज आवाजें सुन मेरे हाथ रुक गए। सिर उठाकर सामने देखा तो जेठानी का रौद्र रुप दिखाई दिया, आदेश मिला -’चावल का डिब्बा उठा और माताजी के कमरे में रख के आ।संयुक्त परिवार की कर्त्तव्य परायण बहू की तरह मैनें डिब्बा उठाया और डरते हुए उनके कमरे में झांका तो देखा वे धोती के पल्लू से आँखें पोंछ रही हैं, मुझे देख शान्त स्वर में बोली - ‘वो तो पागल हो गई है, तू भी?’ वक्त खामोश रहने का था मैने खामोशी से डिब्बा ले जाकर भण्डारघर में रख दिया। बाद में पता चला कि वे चावल मन्दिर में ले जा रही थीं और वो भी सब से छिपा कर। जेठानी ने देख लिया और वे नाराज थीं कि महंगाई के जमाने में इतने बड़े परिवार का खर्चा चलाना भारी हो रहा है और उस पर  बेमतलब की फिजूलखर्ची, जो उन्हे  बिलकुल पसन्द नही। और फिर बातों ही बातों में उन के मुँह से निकल गया किआज पिताजी का श्राद्ध है। उनकी बात सुनकर मेरा मन  कसैला हो गया, माँ पर दया आई और अपने लिए एक फिक्र कि मैं कहाँ हूँ ।उसदिन उन्होने खाना खा कर अपने स्वर्गीय पति को श्रद्धांजलि अर्पित की। रात में सोने के लिए उनके कमरे के सामने से गुजरते हुए मेरा मन और दिमाग दोनों भारी थे,इच्छा हुई कि उनसे बात करुं मगर उनकी चुप्पी के आगे मेरी हिम्मत जवाब दे गई।
सुबह जल्दी उठकर नहाना, मेरे चाय लाकर देने पर चुपचाप पी लेना, पूजा करना, मंदिर चले जाना और शाम के समय छत की मुंडेर थामे शून्य में ताकते हुए कुछ सोचते रहना बस यही दिनचर्या थी उनकी। एक दिन मैं गेहूँ साफ कर रही थी, कि वो समीप बैठ कर मदद करने लगीं, और अचानक उन्होने पूछा-’कितनी पढ़ाई की है तूने? ये जो सामने स्कूल है उसमें नही पढा़ सकती? ‘मैनें कहा - माँ पढा़ने के लिए डिग्री चाहिए, मैनें तो दसवीं भी नही की मेरी बात सुनकर वे मौन हो गई एक बार किसी रिश्तेदार के आगमन पर मैं उनके कमरे में चाय-नाश्ता लेकर गई तो उन्हें कहते सुना- ‘मुझे फिक्र रहती है इसकी। क्यों ले आई मैं इसे? आजकल सरल स्वभाव को कौन पूछता है? ‘जिन को मैं सरल और भोलेपन की मूर्ति समझती थी, उन की दूरदर्शिता और दुनियादारी तो विलक्षण थी, फिर भी वे मजबूर थीं अपने ही बेटे और बहू के सामने, ये बात आज भी मुझे हैरान करती है।
एक दिन घर की खिच-खिच से तंग आकर उन्होनें मुझ से कहा –‘मेरे भाइयों को नही लिख सकती, तेरे बाप को तो कागद लिख सकती है। आकर तुझे ले जाएँ तो सारे झंझटों से मुक्ति पाऊँ और तीर्थों चली जाऊँ।‘
मैने उनके कहने पर भी चिट्ठी नही लिखी मगर कुछ रीति-रिवाजों की रस्में निभाने मेरे पिताजी मुझे कुछ दिनों बाद लिवाने चले आए। मेरे जाने की खुशी उनको मुझ से अधिक थी आशीर्वाद के समय भी कहना नही भूली -’पढा़ई शुरु कर देना डिग्री मिल जाएगी तो नौकरी कर सकेगी।शायद उनका भरोसा अपने बेटे पर से उठ चुका था जो अपनी जिम्मेदारियों और माँ की पीड़ा को नही समझ पा रहा था। अचानक एक बार फिर मिलना हुआ उनसे। मेरी गोद में पोता देखकर उनकी आँखों में खुशी भरी चमक दिखी, धीरे से पूछा -’पढ़ना-लिखना शुरु किया कि नही?‘ मेरे हाँ कहने पर दार्शनिक लहज़े में बोली-’पढ़ाई-लिखाई ही सब कुछ है, बिना पढ़ाई-लिखाई मानव जीवन मिट्टी समान है।मेरी विदाई के समय मैनें चारों तरफ देखा, वे नही थीं। घर से निकल कर गली में आकर देखा, तो वे छत पर खड़ी थीं, मुंडेर पकड़े। मेरे हाथ हिलाने पर उनका  हाथ एक बार उठा और फिर  मुंडेर पर जा लगा
मध्ययुगीन विचारधारा के मेरे ससुरालवालो को मेरा पढ़ना नौकरी करना पसन्द नही आया वे इस संसार में नही रही इसकी सूचना देने की जरुरत भी उनके बेटों ने नही समझी। लम्बा समय बीत गया इन बातों को। हर वर्ष श्राद्ध पक्ष आता है तो मेरा मन भारी हो जाता है -किसे पूछूं उनका श्राद्ध किस तिथि को होता है? हिन्दु संस्कारों में पली-बढी़ वो नालायक बेटों की माँ थीं, जिनको अपने पिता का श्राद्ध याद नही था तो माँ का याद होगा, इसकी संभावना के बराबर  ही थी कुछ दिनों  से मेरे मन में आत्म-मंथन चल रहा है ; कई जगह सुनती हूँ अक्सर  पत्र -पत्रिकाओं में पढ़नॆ को मिलता ही रहता है कि लड़कियों के लिए हालात चिन्ताजनक है, बहुओं की उपेक्षा की जाती है। समाज के किसी भी तबके की महिला की राय जानने का प्रयास कर लें, अधिसंख्यक वर्ग की नजर में सासें कठोर और आलोचना की पात्र ही होती हैं। मगर मुझे जब भी ऐसे विचार पढ़ने और सुनने को मिलते हैं तो उस मौन तपस्विनी की याद जाती है जिसने शिक्षा औऱ स्वावलंबन का रास्ता दिखाकर मेरा पथ -प्रदर्शन किया था। कमजोर और आश्रित होने के बाद भी उनकी सोच सशक्त थी, उनको याद करते ही मस्तक गर्व और श्रद्धा से स्वयंमेव ही झुक जाता है। मैं सोचती हूँ  यदि स्त्री अपने आत्मविश्वास के साथ सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ , अपनी दुर्बलताओं को भाँपें, उनके प्रति सजगता बनाएँ रखें तो उनके लिए आसमान खुला है एक स्वतन्त्र उड़ान भरने के लिए।

XXXXX