शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

“पुष्पवाटिका” ( हाइकु )

चम्पा ,चमेली
गुलाब की कलियाँ
सदाबहार


रात की रानी
रजनीगंधा संग
हरसिंगार


गुलदाऊदी
अष्ट कमल दल
गुलबहार


नीलकमल
चाँदनी ,मौलसरी
रंग हजार


लता कुंज में
भ्रमर-तितलियाँ
करें विहार

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मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

"सीमा"

कई बार हमें सीमाओं का ज्ञान नही होता।
अधिकार और कर्त्तव्य का भान नही होता।।
अधिकार तो चाहिए क्योंकि जन्मसिद्ध हैं।
मगर कर्त्तव्य क्यों नही? वह भी तो स्वयंसिद्ध हैं।।
दोनों एक डोर से बंधे हैं साथ ही रहेंगे।
यदि चाहिए एक तो बिखराव भी हम ही सहेंगे।।

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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

“यकीन”

यकीन तो बहुत है तुम पर ,
सतरंगी सपनों का मखमली अहसास
सुर्ख रंगों की शोखियाँ ;
मैनें बड़े जतन से तुम्हारे अंक में पूर दिए हैं
तुम्हारा अंक मेरे लिए तिजोरी जैसा …,
जब मन किया खोल लिया और
जो जी चाहा खर्च किया
खर्चने और सहेजने का ख्याल ,
ना मैंने रखा और ना तुमने
जिन्दगी बहुत छोटी और नश्वर है
अनमोल और दुर्लभ समझना चाहिए
इसे कतरा-कतरा जीना और
घूंट-घूंट पीना चाहिए ।

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मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

“अवधपुरी” (हाइकु)

अवध जन
देख दुल्हा-दुल्हिन
मुदित मन

हर्षित नृप
रघुकुल नन्दन
राजतिलक

रानी के वर
भये भूप विकल
मूर्छित तन

निर्मल मन
सीय राम लखन
वन गमन

बिन राघव
भई दिशाविहीन
अवधपुरी


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सोमवार, 12 दिसंबर 2016

"फीनिक्स" (हाइकु)

निर्दोष गात
चंचल चितवन
धानी आँचल

खिले प्रसून
सरसे उपवन
बासन्ती मन

तू गतिमान
षट्ऋतु पथ पर
अनवरत

भू तल पर
है 'फीनिक्स' समान
अदम्या नारी


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मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

"अधूरी कविता"

एक अधूरी कविता,सोचा कल पूरी करुंगी
अधूरी इसलिए कि भाव और विचार
आए और चले गए , कल ही की तरह
कल का क्या ? आज के बाद
रोज ही आता है और रोज ही जाता है
कल कभी आया नही और
कविता पूरी हुई नही
मन की बातें…, पन्नों पर बेतरतीब सी
टेढ़ी-मेढ़ी विथियों की तरह
अक्सर मुँह चिढ़ाती हैं तो कभी
सम्पूर्णता हेतु अनुनय करती हैं
मगर क्या करुं….?
दिल आजकल दिमाग का काम करने लगा है
कोमलता की बातें भूल बस
समझ -बूझ की हठ करने लगा है .
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रविवार, 4 दिसंबर 2016

"सीख" (हाइकु)

जीवन पथ
घनघोर अँधेरा
चलता चल

ऊँचे पर्वत
निर्जन उपवन
चलता चल

कठिन लक्ष्य
श्रम तेरी मंजिल
चलता चल

शुभ्र चाँदनी
है तेरी प्रदर्शक
चलता चल

तेरी साधना
अरुणोदय वेला
चलता चल ।।


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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

“हकीकत”

एक मुट्ठी ख्वाबों की
सहेजी एक आइने की तरह
जरा सी छुअन, छन्न से टूटने की आवाज
घायल मुट्ठी, कांच की किर्चों के साथ सहम सी गई।
एक गठरी यादों की
रेशमी धागों सी रिश्तों की डोर
अनायास ही उलझ सी गयी
कितना ही संभालो हाथों को
किर्चें चुभ ही जाती हैं।
सहेजो लाख रेशमी धागों को
डोर उलझ ही जाती है।।


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