रविवार, 19 मार्च 2017

“अवसर”

( 1 )

स्कूल में दसवीं कक्षा में अनिवार्य सा कर दिया था कि प्रवेश-पत्र लेने आने से पूर्व तक हर छात्र-छात्रा को “साक्षरता-अभियान” के अन्तर्गत किसी एक अनपढ़ को अक्षर-ज्ञान से पारंगत करना है । कई बार दूर - दराज मौहल्लों में हमें समूह में स्कूल की तरफ से ले जाया जाता था जहां की अधिकांश महिलाएं और बालिकाएं  अक्षर-ज्ञान से वंचित थीं । मगर कहते हैं न कि इन्सान सदा अपने लिए shortcut ढूंढता है , मैंने भी ढूंढ लिया था । घर काम करने आने वाली महरी जिन्हें हम चाची कहते थे - उनकी बेटी । अक्सर वह चाची के व्यस्त होने पर काम के लिए आया करती थी , मैंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए उसे चुना ।

( 2 )

जब भी वो काम के लिए आती मैं कापी-पेन्सिल लेकर अपने मिशन को पूरा करने के लिए जुट जाती । मूडी होने के कारण कभी वह ध्यान से पढ़ती तो कई बार पढा़ई को बेकार काम बता कर मुझे निराश कर देती ।  एक दिन उसने बर्तन साफ करते हुए बडी़ सी थाली में मिट्टी भर कर अंगुली से अपना नाम उकेर कर मुझे आवाज दी -- 'देख ठीक है !’ मैंने​ खुशी से लगभग चिल्लाते हुए कहा --- 'वाह ! तू तो intelligent निकली ।'


( 3 )

गर्मियों में बिजली गुल होने पर पंखे - कूलर बंद होते ही रात के समय आस-पास की आवाजें साफ सुनाई देती हैं । शादी के गीतों की आवाजें सुन कर पूछने पर पता चला महरी की बेटी की शादी है। दूसरे दिन मैंने पूछा --’ आप इतनी सी उम्र में उसकी शादी क्यों कर रहीं हैं ? मां ने मुझे टोका --'पढा़ई कर ! बड़ों की बात में नहीं बोला करते ।’ लेकिन चाची ने उत्तर दिया बड़ी शांति से ---- 'मेरे जितना कद हो गया है उसका , घर संभाल लेती है । अच्छा वर मिल रहा था अवसर हाथ से कैसे जाने देती ।'
( 4 )

लगभग चार-पांच साल बाद एक दिन  वो गली के छोर पर खड़ी नगर-पालिका में निर्वाचित हमारे ward member को लताड़ रही थी -- ‘ नालियां कितनी गंदी हैं ?  कूड़े के ढेर गली के कोने पे लगे पडे़  हैं। किस बात के नगरपालिका सदस्य हैं आप ? हमारे गांव चलकर देखो आप ! मजाल है कहीं अव्यवस्था मिल जाए।’ उसकी हिम्मत से मैं अचंभित थी बाद में पता चला कि वो अपने ससुराल में अपने वार्ड की निर्वाचित सदस्य थी । नगरपालिका चुनाव में उसका वार्ड  महिलाओं के लिए सुरक्षित सीट वाला था । वो साक्षर थी “अवसर“ मिल रहा था और वो अवसर चूकने वालों में से नही थी ।

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