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रविवार, 28 मई 2017

“हे कृष्णा!”

(This image has been taken from google)

मैं तेरी जोगन सुन  बनवारी
मन मन्दिर में आन विराजो
रास रचैया , गोवर्धन धारी

डगर-डगर ढूँढू तोहे सांवरे
राह निरख नैना भए बावरे
हे गोपेश्वर , पीताम्बरधारी

दधि माखन की  मटकी सारी
चन्द्र कमल मुख पर बलिहारी
श्याम छवि द्युति शोभा प्यारी

देवकी नन्दन , राधा वल्लभ
गोविन्द ,मुरारी, कुंज विहारी
हे मुरलीधर ! हे गिरधारी !

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बुधवार, 24 मई 2017

"कृषक"

सावन-भादौ
रिमझिम बरखा
हर्षित मन

नव उमंग
निरखै हरीतिमा
हँसें नयन

हाल-बेहाल
जलमग्न संसार
खण्डित स्वप्न

धरतीपुत्र
श्रमशाली मानव
आज विपन्न

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रविवार, 21 मई 2017

“क्षणिकाएँ”

                     (1)
कल के साथ जीना कोई बुराई नही
आज की  नींव कल पर धरी है।
आज की सीख कल  काम आएगी फिर
कल को छोड़ अधर-झूल में कैसे जीया जाए।
                      (2)
यादें और पतंग एक जैसी ही होती हैं
डोर से टूट कर एक शाख पर अटकती है ,
तो दूसरी दिल और दिमाग मे ।
बस एक हल्का सा झोंका …..,और
हिलोर खा बैठी।
                      (3)
तारीफ भी अजीब‎  चीज है
इन्सान को चने के झाड़ पर चढ़ा देती है।
उसका तो कुछ नही बिगड़ता
शामत चने के झाड़ की आती है।

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शनिवार, 20 मई 2017

"पोटली"

फटे-पुराने कपड़े और भावों के मंथन में
जब गाँठ लगे तब बनती है पोटली।

आम आदमी के सपने और मजदूर की रोटी
अपने आप में बाँध कर रखती है पोटली।

नन्हे बच्चों की जादुई कहानियाँ और स्वप्निल संसार
मखमली ताने-बाने में छिपा कर रखती है पोटली।

जीवन की कड़वाहट और पुलकन भरी मुस्कुराहट
यादों की परतों में समेट कर रखती है पोटली।

किसी गृहिणी की योग्यता प्रमाणित‎ करती डिग्रीयाँ
धूल की परतों से बचा बड़े जतन से रखती है पोटली।

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रविवार, 14 मई 2017

“जननी”

तेरा उड़ता आँचल
तपते थार में बरगद की छाँव सा
स्नेहसिक्त स्पर्श तेरा
गंगाजल की बूँद सा
थामे तेरी अगुँली
मैं दुर्गम मग तय कर पाऊँ
जो तू ना हो साथ मेरे
नीरव तम में घिर जाऊँ
सागर के भीषण झंझावत में
जब जीवन नैया डोले
विश्वास भरी तेरी वाणी
कानों में अमृत घोले
'प्रकाश-स्तम्भ' मेरी राहों की
पथ-प्रदर्शक मेरी रक्षक !
जीवन जय-पराजय तुझे समर्पित
जननी मेरी तेरी जय ! तेरी जय !

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गुरुवार, 11 मई 2017

"गंगा"

स्कूल से आते समय एक दिन गली में दो गोल -मटोल बच्चों को खेलते देखा,सोचा पड़ोस में  रिश्तेदारी में‎ कोई महिला आईं होंगी । बच्चे सभी मासूम होते हैं मगर उन के चेहरे पर एक अलग सी आत्मीयता भरी मुस्कान थी । रात को खाना खाने के बाद छत पर टहलने गई तो गली की सामने वाली खण्डहरनुमा हवेली के आंगन में रोशनी दिखाई दी,बरसों पुरानी हवेलियाँ कस्बों में देखभाल के अभाव में खण्डहरों में तब्दील हो जाती हैं जिनको कभी इनके मालिकों ने बड़े अरमानों से बनवाया होगा । दूर-दराज क्षेत्रों से व्यापार में धन कमा कर  यहाँ के निवासियों ने अपने रुतबे  का प्रदर्शन करने का शायद यही तरीका अपनाया हुआ था । आजीविका की तलाश  में इन हवेलियों के वंशज भी शहरों की ओर उन्मुख हुए और लौटने का रास्ता भूल गए। कभी-कभार ही कोई भटका मुसाफिर मोह में बँध कर लौटता है तो हैरानी ही होती है।  नीचे‎ उतर कर मैनें अम्मा‎ से पूछा --- ‘ सामने की हवेली में कौन आया है । ‘
                            ‘ गंगा  नाम की औरत आई है अपने दो बच्चों के साथ । पति नशा करता है  कभी काम करता कभी नही इसलिए ये  किसी के यहाँ खाना बनाने का काम करती है उन्ही लोगों ने हवेली का एक कमरा खुलवा दिया है । ‘ एक दिन गली में दिखी वह  अपने बच्चों‎ के साथ । बच्चों के जैसी ही उजली वैसी ही निश्च्छल और जीवन से भरपूर आत्मीय मुस्कुराहट   के साथ । उसकी और उसके बच्चों की मुस्कुराहट को मैं नज़रअन्दाज नही कर पाई और पूछ बैठी ---- “ गंगा आप कहाँ से ---  वाक्य पूरा होने से पहले ही खनकती आवाज़‎ कानों में गूंजी ---- दीदी पहाड़ से ।” घर में घुसते स्मित मुस्कान के साथ मैं सोच रही थी ----गंगा  पहाड़ से …., वास्तव में गंगा हिमालय‎ में अपने उद्गम गंगोत्री से निकल कर निचले मैदानी भूभागों में उतरती है  और यह गंगा भी उत्तरांचल से है।
                               अभावों में भी हँसती मुस्कुराती गंगा शादी-ब्याह के दिनों में अधिक व्यस्त हो जाती उसके मासूम और समझदार बच्चे हवेली के चबूतरे पर बैठे माँ की राह तकते। कई बार वहाँ‎ से निकलते उनकी प्रतीक्षा‎रत उदास‎ आँखें‎ देखी तो कभी कभी माँ के साथ खिलखिलाने के स्वर सुने । रोज के आने-जाने के रास्ते में वह हवेली होने के कारण  मेरा उनसे एक अलग सा रिश्ता हो गया था  ……., मुस्कुराहट का। गंगा को देख  कर कई बार सोचती  कि निश्च्छलता और सौम्यता की  यह अनुकृति कहाँ आ पहुँची। पति के साथ छोटे से प्रकृति के गोद में बसे गाँव को छोड़ते हुए कितने सपने होंगे इसकी आँखों में और कल्पना कर बैठी गंगोत्री से निकल कर कलकल ,छमछम कर इठलाती गुनगुनाती  हरिद्वार से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती गंगा नदी की।
                                         एक दिन बच्चों की अंगुली थामें मुझे ढूंढती गंगा मेरे सामने आ खड़ी हुई-”दीदी मैं जा रही हूँ‎।” कहाँ ? मैनें पूछा‎ । “पहाड़ पर  वहाँ अपने लोग हैं बच्चों का ख्याल रखने को । मजदूरी‎ वहाँ भी कर लूंगी इनको पढ़ाना लिखाना जरूरी  है ना….,मोटा खा-पहन कर काम चला लेंगे , यहाँ सब कुछ महंगा …, दम घुटता है यहाँ ।” अन्दर से अम्मा‎ की आवाज आई- “कौन है? “  मैनें कहा --”गंगा है अम्मा‎ , विदा लेने आई है।”  “ कहाँ जा रही है “बाहर निकलते  हुए उन्होने पूछा।
“वापस पहाड़ पर अम्मा‎ ! यहाँ इसका अस्तित्व‎ जो खो रहा है।”

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सोमवार, 8 मई 2017

“कुरजां”

सुदूर उत्तरी‎ छोर पर
जब घनी बर्फ जमती है तो मरूभूमि में
साइबेरियन सारस आते हैं
और उसके लिए तुम्हारा ख़त।

दुर्लभ हैं वे
साल में एक बार आते हैं
बिछड़ अपने कारवां से
किसी विरहिणी की 'कुरजां'बन जाते हैं।

मासूम सी थी वो
तुम्हारा ख़त पा निहाल हो जाती थी
कभी मन्दिर में फूल सा चढ़ा तो
कभी इबारत पर अंगुली फिराती थी।

अपनी जरूरतों के मुताबिक
वे एक बार जरूर आते हैं
उसके लिए फटे पुराने ख़त में लिखे अक्षर
उसकी व्यथा सुनने वाली 'कुरजां' बन जाते हैं।


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गुरुवार, 4 मई 2017

“नींद”

झिलमिल चाँदनी रात की,
भोर की लालिमा बन जाती ।

नींद कारवां से भटकी मुसाफिर,
बन्द दृग पटलों में भी नही आती ।

चँचल हठीली जादूगरनी,
कितनी मनुहार कराती ।

घर से निकली सांझ के तारे संग
भोर के तारे संग छिप जाती ।

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सोमवार, 1 मई 2017

“परवाह”

तुम्हारी छोटी-छोटी बातें मुझे अहसास करा देती हैं कि तुम्हें मेरी परवाह है मेरी बातों की शुरुआत से पहले ‘एक बात कहूँ’ की मेरी आदत स्मित सी मुस्कान तुम्हारे होठों पर भर देती है मेरे बीमार‎ हो जाने पर प्यार से तुम्हारे हाथ से बनी एक चाय की प्याली मेरे मन में‎ पुलकन भर देती है किसी बहस के दरमियान चीन की दीवार बनकर अहं का द्वन्द कभी-कभी मेरे-तुम्हारे बीच आ जाता है मेरे कान पकड़ कर तुम्हारा ‘सॉरी ‘ बोलना मेरे मन की बर्फ को पानी सा पिघला जाता है तुम्हारी यही छोटी-छोटी बातें मुझे अहसास कराती इस बात का कि तुम्हें‎ मेरी परवाह है XXXXX