रविवार, 27 अगस्त 2017

“अक्सर”

जब भी सूरज चन्द दिनों की खतिर
बादलों की रजाई ओढ़ जब
एकान्तवास में चला जाता है तो
प्रकृति गमगीन सी हो जाती है
तब एक हूक सी उठती‎ है सीने मे
और रगों में लहू के साथ
तुम्हारे साथ जीये खट्टे-मीठे
अनुभूत पलों की याद
बादलों में बिजली की सी
कौंध बन दिल  मे उतर  जाया करती है

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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

“त्रिवेणीयाँ” (2)

   (1)


मखमली आवरण के स्पर्श‎ का अहसास
सदा मुलायमियत भरा नही होता ।


कभी कभी‎ उसमें  भी फांस की सी चुभन होती है ।।


                  ( 2)


रोज रोज यूं जाया ना करो
खालीपन अच्छा नही लगता ।
सांसो की जगह घबराहट दौड़ने लगती है ।।


                  (3)

अब की बार सावन झूम के बरसा था
सोचा सारा मैल धुल जाएगा ।

मगर काई तो वैसे ही जड़ पकड़े बैठी है ।।

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बुधवार, 16 अगस्त 2017

“त्रिवेणीयाँ” (1)

कोशिश की है कुछ नया करने की ।  कभी पढ़ी थी गुलजार साहब की लिखी‎  त्रिवेणियाँ ….,लगा बात कहने का हुनर शायद ही जुट पाए  लेकिन मन तो मन ठहरा उसने  चाहा प्रयास करना  चाहिए । 

                (1)

सारी दोपहर यूं ही खर्च कर दी‎
कुछ लिखकर काटते हुए ।

सोचों में डूबा मन बिलकुल  खाली था ।
 
                 (2)

गाँव दिन भर  चादर तान के सोया था
सांझ ढले घरों में उठते धुएँ से सुगबुगाहट हुई है ।

भोर होते ही  वह फिर सो जाएगा।

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मंगलवार, 15 अगस्त 2017

"रक्षक"

हमारी मातृभूमि के रक्षक वीर जवानों को स्वतन्त्रता दिवस पर समर्पित एक छोटी सी रचना –
हिम किरीट के रक्षक तुम,तुझ में शक्ति अपार
तुम से रक्षित गौरव राष्ट्र का, तुझे वन्दन बारम्बार
हे मातृभूमि रक्षक तुझे प्रणाम !
उतंग गिरि ,बर्फीली राहें,तुम सरहद के पहरेदार
दुर्गम मरुस्थल,निर्जन कानन,तुम नैया खेवनहार
हे जन्मभूमि रक्षक तुझे प्रणाम !
Happy Independence day to all.
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सोमवार, 14 अगस्त 2017

“महारास”

तारों की उजली छाँह तले
जब आसमान के आंगन में ,
चन्दा और चान्दनी
मुदित भाव से मिलते हैं ।

और धरती के इस आंगन में
पुरुवाईयों  के झोको  से,
बेला , चम्पा , गुलाब संग
रजनीगंधा महकते हैं ।।

तब वृन्दावन में यमुना तट पे
पूर्णचन्द्र सम कृष्णचन्द्र ,
वृषभानुसुता और गोपियों संग
महारास में सजते हैं ।।

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"कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आप सब को परिवार सहित हार्दिक शुभ कामनाएँ"

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

"चाँद"



क्षितिज  पर उठता  
पूर्णिमा का चाँद ,
रजत के थाल सा।
आसमान के आँगन में उतरता,
सिन्दूरी ज्वाल सा ।
व्योम-धरा का प्रेम प्रतीक,‎
किसी तरूणी के बाल गोपाल‎ सा ।  
तमाल तरूवर की शाख पे अटका
प्रकृति के अनुपम उपहार सा ।

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सोमवार, 7 अगस्त 2017

“रेशमी धागे”


रेशमी धागों की माया बड़ी अपरम्पार है
तुम्हारे आने की चाह में
ये कभी कुम्हला जाते हैं
तो कभी उलझ जाते हैं
बंधते तो साल में एक ही बार हैं
मगर बंधन की मजबूत पकड़
बड़ी गहरी होती है
एक बार बंधने के बाद रिश्तों में
दूरी हो या नजदीकी
एक दूसरे की शुभेच्छा की आंकाक्षा
आकंठ आपूरित होती है.

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शनिवार, 5 अगस्त 2017

“मौन”

फिजाओं में शोर बहुत है
मौन की चादर अपने वजूद से
लपेट मन किसी  कोने में
गहरी नीन्द में सो रहा है 
कस कर शरीर की खूटियों से
बाँधा है ऐसे कि किसी हवा के झौके से
नींद में कहीं खलल ना पड़ जाए
खलल पड़ेगा भी कैसे…?
दिमाग ने वरदान जो दे रखा है
कुम्भकर्ण की तरह सोने का .

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मंगलवार, 1 अगस्त 2017

“सावन” (हाइकु)

कारे बदरा
रिमझिम बरसै
मन हरषै

नाचे मयूर
कोयल की कुहूक
मनभावन‎

मुदित जीया
हरी-भरी धरा
अम्बर खिला

धानी चूनर
लहर लहराए
गौरी मुस्काए

श्रावणी तीज
शिव-गौरी पूजन
भक्ति की शक्ति‎

स्नेह की डोर
पावन अवसर
रक्षाबन्धन

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