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गुरुवार, 21 सितंबर 2017

“पीड़ा”

मन की पीड़ा
बह जाने दो  ।
बहते दरिया में वो
हल्की हो जाएगी ।
गीली लकड़ी‎ समान
होती है  मन की पीड़ा ।
जब उठती है तो
सुलगती सी लगती है  ।
और आँखों में धुएँ के साथ
सांसों में जलन सी भरती है ।
पता है ……. ?
ठहरे पानी पर
काई ही जमती है ।
थमने से वजूद  
खो सा जाता है  ।
चलते रहो …..,
यही‎ जिन्दगी है ।

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शनिवार, 16 सितंबर 2017

“त्रिवेणी"


                  (1)

पछुआ पुरूवाई संग सौंधी सी महक है
कहीं  पहली बारिश  की बूँद गिरी होगी ।

माँ के हाथ की सिकती रोटी  यूं ही महका करती थी ।।

                   (2)
 
ढलती  सांझ  और नीड़ में लौटते परिन्दे
सूरज संग मन भी डूबता जाता है ।

ईंट पत्थरों से बने हो वर्ना हिचकी जरूर आती ।।

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रविवार, 10 सितंबर 2017

“त्रिवेणी"

(This image has been taken from google)
( 1 )

प्रकृति में रूक्षता और कठोरता दिखती है
ओस कण तो मृदुल और तरल होते हैं ।

लगता है कभी‎ अपनापा बड़ा गहरा रहा होगा ।।

( 2 )

ताल के सोये पानी को कंकड़ी मार
शरारती बच्चे ने गहरी नीन्द से जगा दिया ।

तुम  से मिल के भी  बस यूं ही हलचल हो जाती है।।

( 3 )

बहुत सारे  फूल  हवाओं के झकोरों संग
झुण्ड के झुण्ड शाखों को छोड़ कर चल दिए ।
शायद अस्तित्व‎ की तलाश में ।।

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बुधवार, 6 सितंबर 2017

“जड़ें”



(This image has been taken from google)

बे वजह ना जाने क्यों …….,
आजकल मन
बड़ा भटकता है ।
जो हो रहा है  वह भाता नही
और जो नही है
उसके कोई मायने नही ।
जड़ें चाहे पेड़ की हो
या इन्सान की कटे तो
तकलीफ ही होती है ।
और हो भी ना क्यों ………,
इनकी पकड़
जो गहरी होती है ।

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शनिवार, 2 सितंबर 2017

“वादा”

एक वादा था तुमसे
जो खेल खेल में कर दिया
जमीं पे तारे और पूनम के चाँद का ।
काम जरा मुश्किल सा था
मगर बात जिद्द की भी थी ।
गुलमोहर के नीचे
स्याह रात में बड़े जतन से
मुट्ठी भर जुगनू लाकर छोड़े हैं ।
तारों की चमक तो आ गई
बस पूनम के चाँद की कमी है ।
तुम्हारे आने से वह कमी भी पूरी हो जाएगी
और जो बात  अब अधूरी सी है
वो बाद में पूरी हो जाएगी ।

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