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रविवार, 22 जुलाई 2018

"मनाही"

हम मिलें यह इजाजत नही है
आप से तो शिकायत नहीं है

नक्श दिल से मिटाये हमारे ।
फिर हमें भी लगावट नहीं है ।।

इश्क  करना बुराई  कहां है ।
हम करें यह इनायत नही है।।

क्यों रखे  यूं अजनबी निगाहें ।
आप से  तो अदावत नहीं है ।।

तुम कहो दास्ताने  मुहब्बत ।
हम सुने तो शराफत नही  है ।।
 
XXXXX

बुधवार, 18 जुलाई 2018

"सेदोका”

        (1)

अंजुरी भर
रंग छिड़क दिये
कोरे कैनवास पे
उभरा अक्स
ओस कणों से भीगा
जाना पहचाना सा

(2)

धीर गंभीर
झील की सतह सा
सहेजे विकलता
मन आंगन
कितना  उद्वेलित
सागर लहरों सा

  (3)

तुम्हारा मौन
आवरण की ओट
कहानी कहता है
एक लक्ष्य है
अर्जुन के तीर सा
चिड़िया के चक्षु सा


XXXXXXX

बुधवार, 11 जुलाई 2018

"प्रहरी"

सरहद के रक्षक वीर ,
चैन से कब सोते हैं ।
हम जीयें अमन के साथ ,
ये सीमाओं पर होते हैं ।।

घनघोर अंधेरों में भी ,
ये दुर्गम पथ पर होते हैं ।
रखते निज देश का मान ,
चैन दुश्मन का खोते हैं ।।

बोले जय हिन्द की बोली ,
खा के सीमा पर गोली ।
देते अपना बलिदान ,
खेल अपने खून से होली ।

हे मेरे देश के वीर !
तुझ को मेरा अर्चन है ।
मेरी आंखों का नीर ,
श्रद्धा से तुझे अर्पण है ।।

XXXXXXX

सोमवार, 9 जुलाई 2018

"नाराजगी"

समझे न जो कोई बात उसे समझायें कैसे ।
दिल में दबी बात लबों तक लायें कैसे ।।

सच और झूठ का फर्क है बहुत मुश्किल ।
जो सुने न मन की बात उसे सुनायें कैसे ।।

नाराज़गी तो ठीक , अजनबियत की कोई वजह ।
नाराज़  है जो बिना बात उसे मनायें कैसे ।।

बेपरवाही , अनदेखी ,बेकदरी जज़्बातों की ।
टूटे अगर यकीन उसे दिलायें कैसे ।।

मंजिल और राहें एक मगर सोचें जुदा जुदा ।
नादानियों के दौर में अब निभायें कैसे ।।

XXXXXXX

बुधवार, 4 जुलाई 2018

"उम्मीद"

काली घटा घिरी अम्बर पे ।
पछुआ पवनें चली झूम के ।।
हर्षित किसान चला खेत पे ।
करता  चिन्तन अपने मन में ।।

नाचे मोर कुहके कोयलिया ।
बैलों के गले रुनझुन घंटियां ।।
घर भर में हैं छाई खुशियां ।
अब के सीजन होगा बढ़िया ।।

मानसून बढ़िया निकलेगा
मेहनत होगी खेत हँसेगा
साहूकार का कर्ज चुकेगा ।
यह साल अच्छा गुजरेगा ।।

हैं हम सब के साझे सपने
गैर नहीं यहां सब हैं अपने ।
खुशियों से ये पलछिन बीते
सावन से तो जुड़ी उम्मीदें ।।

हाथ जोड़ कर करे प्रार्थना
प्रकृति माँ से यही याचना ।
भूमि पुत्र हो हर्षित मन से
अब के सावन झूम के बरसे ।।

  XXXXXXX

रविवार, 1 जुलाई 2018

"परामर्श"

इतने गर्वीले कैसे हो चन्द्र देव ?
कितना इतराते हो पूर्णिमा के दिन ।

क्या उस वक्त याद नहीं रहते बाकी के पल छिन ?
पूरे पखवाड़े कलाओं के घटने बढ़ने के दिन ।

सुख-दुःख , हानि-लाभ तो सबके साथ चलते हैं ।
तुम्हारी देखा देखी में सीधे इन्सान भी इतरते हैं ।।

तुम तो देवता ठहरे , सब कुछ झेल लेते हो ।
हम इन्सानों को , दर्प की गर्त में ढकेल देते हो ।।

चंचलता छोड़ो देव तुम मान करो कुछ देवत्व का ।
फिर सीखेंगे हम भी निज अहं त्याग करने का ।।

                   XXXXXXX

गुरुवार, 28 जून 2018

"मुक्तक"

आप अपने मन की सुना कीजिए ।
और सच के मोती चुना कीजिए ।।
क्यों उलझते हैं तेरे मेरे के फेर में ।
बहते दरिया की तरह से बहा कीजिए

हम.मिलते तो कभी कभी हैं ।
मगर लगता दिल से यही है ।।
साथ है हमारा कई जन्मों से ।
सच है ये कोई दिल्लगी नही है ।।

जीने का शऊर आ गया तेरे बिन
तूने भी.सीख लिया जीना  मेरे बिन
जरूरी है आनी दुनियादारी भी
मुश्किल है जिन्दगी काटनी इस के बिन

गिर कर संभलना , संभल कर चलना
हर दिन नये हुनर सिखाती है जिन्दगी ।
नित नई भूलों से , नित नये  पाठ
समय के साथ सिखाती है जिन्दगी ।।
XXXXXXX

सोमवार, 25 जून 2018

"हम भी काम कर लेते हैं'

चलिये आज हम भी कुछ काम कर लेते हैं ।
खाली  वक्त भरने.का इन्तजाम कर लेते हैं ।।

बन जाइए आप भी रौनक- ए- महफिल ।
हुजूर में आपके सलाम कर लेते हैं ।।

चैन-ओ-सुकूं से  यहाँ कोई जीये कैसे ।
नजरों से भी लोग कत्लेआम कर लेते हैं ।।

गैरों को भी कई बार अपना समझ लेते हैं हम ।
नादानियों में अपना किस्सा तमाम कर लेते हैं ।।

वक्त की नजाकत समझने में लगती है देर ।
सांसें  भी आपकी वे अपने नाम कर लेते हैं ।।

XXXXXXX

बुधवार, 20 जून 2018

एक दिन” (हाइकु)

खिल जाते हैं
कमलिनी के फूल
भोर के साथ

अपने आप
सिमटी पंखुडियां
सांझ के साथ

रंग बिरंगी
मीन क्रीड़ा करतीं
लगती भली

ताल किनारे
गुजरे कुछ पल
सांझ सकारे

विश्रांति पल
कुदरत के संग
देते उमंग


XXXXXXX

बुधवार, 13 जून 2018

"मुक्तक"

                       (1)

कुछ तुम कहो कुछ मैं कहूँ , बाकी सब बातें जाओ भूल ।
बेकार की है दुनियादारी , नही होते इस से कुछ दुख दूर ।।
औरों की बात करो मत तुम , सब अपनी अपनी करते हैं ।
इस देखा देखी के चक्की में , बस हम जैसे ही पिसते हैं ।।

                          (2)

कल तक जो थे मेरे अपने , अब बेगानों सी बातें करते हैं ।
अपना अपना हम करते हैं , ये अपने ही छल करते हैं ।।
मुठ्ठी में बंद मखमली ख्वाब , तितलियों की तरह मचलते हैं ।।
पा कर खुद को आवरण बद्ध , मुक्ति के लिए तरसते हैं ।।

                         XXXXX

शुक्रवार, 8 जून 2018

" सांझा - चूल्हा"

सब को लेकर साथ चलना
सब के मन की बात पढ़ना
आसान नहीं कठिन सा है ।
बेसब्री और केवल मेरी 'मैं’
औरों के सिर पर पांव रख कर
केवल अपना भला सोचती है ।
कभी - कभी सोचती हूं
जगह -जगह सांझा - चूल्हा
रेस्टोरेंट्स तो खुल गये हैं ।
कहीं सांझा -चूल्हा संकल्पना भी बाकी है
जहां रोटियों के साथ नोंक झोंक
और स्नेह - प्यार भी पकता है ।
सांझे - चूल्हे में रोटियां सेंकने को
इन्तजार करना पड़ता है
अपनी अपनी बारी का ।
गावों की मेहनत कश
औरतें निबाहती है फर्ज
अपनी साझेदारी का ।
सह अस्तित्व का भाव
हो तो सब काम
अपने आप सधते हैं ।
और एक दूसरे के
सुख-दुख  आपस में
मिल जुल कर बंटते हैं ।

    XXXXX



मंगलवार, 5 जून 2018

"मुलाकात"

हम तो मिलने के बहाने आ गए ।
दोस्ती को आजमाने आ गए ।।

मिलने का वादा था चांद रात का ।
वो वादा  तुम से निभाने आ  गए ।।

चांद के दीदार का बहाना बना।
दोस्ती का कर्ज चुकाने आ गए ।।

सीढ़ियों पर भाग कर आते कदम ।
बीते दिन फिर से दिखाने आ गए ।।

मैं कहूं कुछ या तुम मुझ से कहो ।
याद हम को  दिन पुराने आ गए ।।

XXXXX

शुक्रवार, 1 जून 2018

"एक दिन पहाड़ों वाला"



पहाड़ों के ठाट भी बड़े निराले हैं
मरकत और सब्ज रंगों से सजे
अपनी ही धुन में मगन ।
कुदरत ने भी दोनों हाथों सेे
नेह की गागर इन पर
बड़े मन से छलकी है ।
सांझ होते ही बादलों की
टोलियां इनकी ऊंची चोटियों पर
अपना डेरा डाल देती हैं ।
रात के आंगन में जुगनूओं की चमक
और दूर वादी में ढोल की थपक
फिजाओं में संगीत घोलती है ।
भोर के उजाले में
पूरी की पूरी कायनात
स्वर्णिम आभा से नहा उठती है ।
बातों के पीर तरह तरह के पंछी
अपनी गठरियों से किस्से  कहानी
सुनाते दिन भर चहकते हैं ।
और सारा दिन यूं ही चंचल  हिरण सा
कभी इस घाट तो कभी  उस घाट
कुलांचे भरता आंखों से ओझल हो जाता है।

        XXXXX

शनिवार, 26 मई 2018

“कशमकश”

फुर्सत के लम्हे रोज़ रोज़ मिला नहीं करते ।
सूखे फूल गुलाब के फिर खिला नहीं करते ।।

छूटा जो  हाथ एक बार दुनिया की भीड़ में ।
ग़लती हो अपने आप से तो गिला नहीं करते ।।

आंधियों का दौर है , है गर्द ओढ़े आसमां ।
चातक को गागर नीर हम पिला नहीं सकते ।।

देने को साथ कारवां में लोग हैं बहुत ।
खोया है गर यकीं तो फिर दिला नहीं सकते ।।

सोचूं ऐ जिन्दगी तुम्हें मैं गले से लगा लूं ।
रस्मे वफ़ा-ए-इश्क से फिर हिला नहीं सकते ।।

                  XXXXX

रविवार, 20 मई 2018

"मुक्तक"

( 1 )
सहमति  हो किसी बात के लिए भी ।
संभव नहीं ये किसी के लिए भी ।।
कई बार मौन भी ओढ़ना पड़ता है ।
सब के अमन-चैन के लिए भी ।।
                 
                ( 2 )

निहारना चांद को भला सा लगता है ।
सौंदर्य का रसपान भी अच्छा सा लगता है ।।
खूबसूरती की कमी तो सूरज में भी नहीं ।
बस नजरे चार करना ही टेढ़ी खीर सा लगता है ।।

XXXXX

गुरुवार, 17 मई 2018

"गुफ्तगू" (ताँका)

    ( 1 )
समय चक्र
कुछ पल ठहरे
तो मैं चुन लूं
स्मृतियों के  वो अंश
छूटे है यहीं कहीं
       ( 2 )
वक्त के साथ
निश दिन चलते
थका है मन
प्रतिस्पर्धी होड़ से
रूक कर सुस्ता लूं
     ( 3 )
मेरे अपने
तेरा हाथ पकड़
चलना चाहूं
एक नई डगर
बन के सहचर
     (4 ) 
गर खो जाए
दुनिया की भीड़ में
दीप यकीं का
प्रज्जवलित रखें
मन के आँगन में

     XXXXX

रविवार, 13 मई 2018

"एक चिट्ठी"

गर्मी की छुट्टियों की दोपहर
और मेरे गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह में ।
मुझे तुम्हारी टोका-टाकी
अच्छी नही लगती थी ।।
मगर तुम भी यह
अच्छे से जानती थी कि मैं ।
तुम्हारे प्यार के बिना इस दुनिया‎ में
नितान्त अकेली और एकदम डरपोक थी ।
रात के अँधेरे में  तुम्हारे दुलार भरे
स्पर्श बिना नींद भी कहाँ आती थी ।
तुम्हारे बचपन की बातें माँ ! लोरी के साथ
जैसे सावन की ठण्डी बयार लाती थी ।।
तुम्हारा दुलार भरा हाथ
दृगों को नींद से बोझल कर देता था।
ममता भरा आँचल सोने सा संसार रच देता था ।।
इस दुनिया की तरह शायद तुम्हें
उस दुनिया में भी बहुत काम थे ।
तुम्हारे बिना रिश्ते  थे तो बहुत
मगर सिर्फ नाम ही नाम के थे ।।
तुम्हारे जाने के बाद मैनें
डरना छोड़ दिया था ।
शरारतों से दोस्ती छोड़
समझदारी का कम्बल ओढ़ लिया था ।।
अगली बार मेरे लिए फुर्सत से आना
माँ ! तुम से कुछ साझा करना बाकी है ।
तुम्हारी अविभाज्य बन  तुम्हारे साथ असीमित
प्यार और सम्मान का प्रतिदान बाकी है ।।

               XXXXX

मंगलवार, 8 मई 2018

"घर"

बहुत बरस बीते
बचपन वाला घर देखे ।
अक्सर वह सपने में  मुझ से
मिलने बतियाने आ ही जाता है ।।
उम्र तो पहले भी अधिक ही थी
अब तो और भी बूढ़ा हो गया है ।
वक्त के साथ दीवारों की सींवन
कई जगहों से उधड़ी सी दिखायी देती है ।।
कल सपने में देख कर लगा था
आजकल उदास रहने लगा है ।
नश्वरता और क्षण‎भंगुरता का दर्द
जर्जरता के साथ टपकने लगा है ।।
जी करता है दौड़ कर आऊँ
और  आ कर तुम्हारे गले लग जाऊँ ।
तुम्हारे आंगन की सौंधी खूश्बू
अपने आँचल में भर कर‌ ले आऊँ ।।
हसरतें हैं इतनी तुमसे मिलने की
तुम्हे अनुमान नही होगा ।
अपने बीच पसरे इस वनवास का
ना जाने किस दिन अवसान होगा ।


          XXXXX




मंगलवार, 1 मई 2018

"क्षणिकाएँ"

        
  ( 1 )

अच्छी लगी
तुम्हारी आवाज में
लरजती मुस्कुराहट ।
बहुत दिन बीते यह
दुनियादारी की भीड़ में
खो सी गयी थी ।।

    ( 2 )

जागती आँखों से देखे
ख़्वाब पूरा करने की जिद्द
अक्सर दिखायी देती है ।
तुम्हारी हथेलियों की
सख्ती और मेरे
माथे की लकीरों में ।।

       ( 3 )

ऐसी भी कोई‎
बात नही कि मन का
तुमसे कोई मोह नही ।
बस तुम्हारी  “मैं” को
संभालना जरा टेढ़ी
खीर जैसा लगता है ।।

   XXXXX

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

"प्रकृति" (हाइकु)


ढलती सांझ
घिर आए बादल
भीगी सी रातें ।            

भोर के साथ
करते कलरव
पेड़ों पे पंछी ।

ओस की बूदें
मकड़ी के जालों में
मोती सी गुंथी ।

छाया उल्लास
पुलकित वसुधा
अम्बर हँसा ।

ये सारे दृश्य‎
सौगात प्रकृति की
खो नही जाए ।

बढ़ी आबादी
सिमटी कुदरत
चिन्ता जनक ।

सृष्टि की रक्षा
कर्तव्य मनुष्य का
होना चाहिए।

XXXXX

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

"प्रश्न"

कुछ दिन से मन उदास
और अभिव्यक्ति‎ खामोश है
समाज में असुरक्षा की सुनामी ने
सोचों का दायरा संकुचित और
जीवन पद्धति का प्रतिबिम्ब
धुंधला कर दिया है
कोमलकान्त पदावली के साथ
प्रकृति और जीवन दर्शन
में उलझा मन कुछ भी
कह पाने में असमर्थ है
क्या यही है मेरी संस्कृति
जो कन्या को देवी मान
नवरात्र में चरण पूजती है
और यत्र नार्यस्तु पूज्यते
रमन्ते तत्र देवता कह कर
नारी सम्मान का
आह्वान करती है
विश्व के सब से बड़े
लोकतन्त्र का यह
कैसा रूप हो गया है
नारी का रक्षक मानव
दानव सदृश्य हो गया है

XXXXX

रविवार, 15 अप्रैल 2018

“उपालम्भ"

अवसर मिला “तिब्बतियन मॉनेस्ट्री” जाने का । तिब्बतियन शैली में बने भित्तिचित्रों में भगवान बुद्ध‎ के जीवन-चरित और उनकी भव्य प्रतिमा को देख मन अभिभूत हो उठा । स्कूल लाइब्रेरी में स्व.श्री मैथलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ पढ़ने को मिली जिसको पढ़ते हुए ना जाने कितनी बार मन और आँखों के कोर  गीले हुए । भगवान बुद्ध‎ की प्रतिमा के सामने नतमस्तक होते हुए यशोधरा की व्यथा का भान हो आया और उपालम्भ मन से फूट पड़ा ।





मैं तुम्हारी यशोधरा तो नही....,
मगर उसे कई बार जीया है
जब से मैनें ......,
मैथलीशरण गुप्त का
“यशोधरा” काव्य पढ़ा है
करूणा के सागर तुम
सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध‎ बने
अनगिनत अनुयायियों के
पथ प्रदर्शक तुम
अष्टांगिक मार्ग और बौद्ध‎धर्म के
जन्मदाता जो ठहरे
तुम्हारे बुद्ध‎त्व के प्रभामण्डल के
समक्ष नतमस्तक तो मैं भी हूँ‎
मगर नम दृगों से तुम्हारा
ज्योतिर्मय रूप निहारते
मन के किसी कोने में
  एक प्रश्न बार बार उभरता है
हे करूणा के सागर !
तुम्हारी करूणा का अमृत
जब समस्त जड़-चेतन पर बरसा
तो गृह त्याग के वक्त
राहुल और यशोधरा के लिए
तुम्हारे मन से नेह का सागर
 क्यों नही छलका ?

XXXXX