शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

“चाँद"

चाँद निकलता है रात में,
लेकिन कभी कभी‎
यह दिन में भी
दिखता है ।
फर्क बस इतना है
रात वाला चाँद,
धुला धुला सा
निखरा और उजला सा ,
पेड़ों की फुनगियों से झांकता 
दुख में दुखी
और खुशियो में ...., 
"चार चाँद लगाता” 
दीखता है ।
 लेकिन दिन वाला चाँद ,
खून निचुड़ा सा
रूई का सा फाहा
शक्ति हीन और श्री विहीन
हालात का मारा
आम आदमी सा
 दीखता है ।

           xxxxxxx

13 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १२ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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    1. ध्रुव सिंह जी अत्यन्त‎ आभार निमन्त्रण एवं सम्मान‎ हेतु.

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  2. बेहद हृदयस्पर्शी रचना मीना जी...वाहह

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  3. वाह!!मीना जी ,बहुत उम्दा।

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    1. बहुत‎ बहुत‎ धन्यवाद ज्योति जी.

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    2. सवाल उठता है -आम आदमी 2015 वाला या आम आदमी 2018 वाला? पहले वाला आम आदमी तो रात के चाँद की तरह दमकता था पर आज का आम आदमी दिन के चाँद की तरह मलिन और आभा-हीन है.

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    3. वही आम आदमी जो मूलभूत सुविधाओं से वंचित है और उन्हें पाने के लिए‎ सपने देखता है. बहुत लम्बे‎ समय के बाद अपने ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया‎ स्वरूप उपस्थिति‎ देखकर खुशी हुई.

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"