रविवार, 13 मई 2018

"एक चिट्ठी"

गर्मी की छुट्टियों की दोपहर
और मेरे गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह में ।
मुझे तुम्हारी टोका-टाकी
अच्छी नही लगती थी ।।
मगर तुम भी यह
अच्छे से जानती थी कि मैं ।
तुम्हारे प्यार के बिना इस दुनिया‎ में
नितान्त अकेली और एकदम डरपेक थी ।
रात के अँधेरे में  तुम्हारे दुलार भरे
स्पर्श बिना नींद भी कहाँ आती थी ।
तुम्हारे बचपन की बातें माँ ! लोरी के साथ
जैसे सावन की ठण्डी बयार लाती थी ।।
तुम्हारा दुलार भरा हाथ
दृगों को नींद से बोझल कर देता था।
ममता भरा आँचल सोने सा संसार रच देता था ।।
इस दुनिया की तरह शायद तुम्हें
उस दुनिया में भी बहुत काम थे ।
तुम्हारे बिना रिश्ते  थे तो बहुत
मगर सिर्फ नाम ही नाम के थे ।।
तुम्हारे जाने के बाद मैनें
डरना छोड़ दिया था ।
शरारतों से दोस्ती छोड़
समझदारी का कम्बल ओढ़ लिया था ।।
अगली बार मेरे लिए फुर्सत से आना
माँ ! तुम से कुछ साझा करना बाकी है ।
तुम्हारी अविभाज्य बन  तुम्हारे साथ असीमित
प्यार और सम्मान का प्रतिदान बाकी है ।।

               XXXXX

8 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १४ मई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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    1. आभार ध्रुव सिंह जी ."लोकतन्त्र संवाद" मंच से जुड़ना मेरे लिए‎ सदैव हर्ष का विषय होता है .

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  2. मीना जी, आपने तो बिछड़ी हुई माँ की याद दिला दी. 56 साल से भी ऊपर की उम्र थी मेरी, जब माँ का स्वर्गवास हुआ था पर उनके लिए मैं अल्हड़, नादान और शरारती, घर का छोटा बच्चा था. माँ नादान, भोली और मासूम ही होती है. इस ज़ालिम ज़माने की हवा उसे लगती ही नहीं है.

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  3. बहुत बहुत धन्यवाद गोपेश जी.आपकी प्रतिक्रिया‎ सदैव उत्साहवर्धक होती है . सही कहते हैं आप.., माँ की छत्रछाया में हमारा अल्हड़पन सदैव सुरक्षित‎ रहता है .

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  4. वाह मीना जी बहुत खूब आपकी लेखनी को...शब्द आपके किन्तु बातें सबके मन की...बहुत बहुत बधाई !

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  5. आपकी लेखन के प्रति मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया‎ के लिए‎ हार्दिक धन्यवाद .रचना के भाव आपके मन तक पहुंचे‎, मेरा लिखना सफल हुआ‎ .

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  6. कई बार माँ के जाने के बाद बहुत कुछ कहने का मन करता है उससे ... उसके साथ बाँटने का मन ... और ये इच्छा उसके जाने पे प्रबल हो जाती है ... यही तो प्रेम है माँ का ... सुंदर रचना ...

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  7. उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से शुक्रिया नासवा जी ।

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“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"